“AI तस्वीर बदल सकता है, तकदीर नहीं | जब दादा ने AI से माँगा दादी के दिल का प्यार ❤️”
ए.आई. तस्वीर बदल सकता है, तक़दीर नहीं
#AI तस्वीर बदल सकता है, तकदीर नहीं। यह भावुक हिंदी कविता AI और इंसानियत के रिश्ते पर एक गहरा संदेश देती है। दादा-दादी के हास्यपूर्ण संवाद से शुरू होकर कविता रिश्तों, माँ-बाप, प्रेम, अपनापन और संवेदनाओं की अहमियत समझाती है।
देखो दादा! आप इक्कीस के और दादी सोलह साल की बना दी,
आपको कोट-पैंट और दादी को साड़ी पहना दी।
पुत्तर! यह कैसे कर दिया, मुझे भी बता दे,
मुझमें अंदर से इश्क़ और दादी में प्यार जगा दे।
नहीं दादा! इतना नहीं हो पाएगा,
तो फिर पुत्तर तेरा ये “ए.आई.” मेरे किसी काम नहीं आएगा?
मेरा गौरी चमड़ी, भरी जवानी और हुस्न से क्या काम,
तेरी दादी के आगे बैठा हूँ, फिर भी हूँ नाकाम।
तस्वीर बदलने से अंदर के जज़्बात बदलेंगे थोड़े ही ना,
मैं शरीफ़ दिख रहा हूँ तस्वीर में,
फिर भी तेरी दादी गुस्सा छोड़ेंगी थोड़े ही ना!
तूने बाल काले कर दिए, झुर्रियाँ सारी मिटा दीं,
चेहरे पर जवानी की चमक भी खूब सजा दी।
मगर सब पर पानी फेर, देखा! तेरी दादी ने क्या जवाब दिया—
“इस चमगादड़ को सजाने में किसने वक्त बर्बाद किया?”
अब तो हद हो गई पुत्तर, “ए.आई.” से कह कुछ ऐसा काम कर दे,
दादी के दिल में मेरे प्रति थोड़ा-सा प्यार भर दे।
नहीं दादा! यहीं पर ए.आई. हाथ छोड़ देता है,
बुद्धि तो देता है, मगर विश्वास तोड़ देता है।
मैं तस्वीर बना सकता हूँ, तक़दीर नहीं,
मैं चेहरा बदल सकता हूँ, चरित्र नहीं।
मैं आवाज़ बदल सकता हूँ, भावनाएँ नहीं,
चेहरे के भाव बदल सकता हूँ, संवेदनाएँ नहीं।
पुत्तर! काश तेरा “ए.आई.” एक काम और कर देता,
बाहर के साथ-साथ अंदर की संवेदनाएँ भी बदल देता।
जिसके दिल में नफ़रत है, उसमें थोड़ा प्यार भर देता,
जो अपनों से रूठा है, उसे अपनों की कीमत समझा देता।
जिसके घर में माँ अकेली है, उसे माँ का दर्द दिखा देता,
जो पिता को बोझ समझता है, उसे पिता का संघर्ष बता देता।
जिस भाई ने भाई को छोड़ा है, उसे बचपन की याद दिला देता,
जिस रिश्ते में अहंकार बसा है, उसमें अपनापन जगा देता।
फिर तो दुनिया बदल जाती, हर चेहरा मुस्काता,
कोई किसी को धोखा न देता, कोई किसी को न सताता।
फिर मरने वाला भी आठ-दस साल और खींच जाता,
बीमारी के बावजूद, उम्मीद के सहारे जी जाता।
सब काम छोड़कर हर इंसान “ए.आई.” सीख जाता,
मगर एक बात आड़े आती कि ए.आई. इंसानियत से कैसे मेल खाता?
संभतः परिणाम फिर अच्छे नहीं होते ।
दुनिया में चेहरे तो हजारों होते,
पर इंसान नहीं होते!
पुत्तर! ए.आई. को संभाल, मुझे जाने दे,
हर रोज़ की तरह आज फिर दादी को मनाने दे।
दादी बोली—
“चल ए.आई., कुछ नया तो सिखा गया,
मेरा बुड्ढा समय से मुझे मनाने आ गया!”
बस यही तो बात है—
ज़रूरत बाहर की नहीं, अंदर बदलने की है,
ज़रूरत एक-दूसरे के जज़्बात समझने की है।
अब झुर्रियाँ नहीं, दिल की दूरियाँ मिटाएँगे,
ए.आई. को दोस्त बनाकर
खुशहाल जीवन बितायेंगे।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें