Chal Uth Balika! Aaj Har Balika Ko Maa Kali Banane Ki Zarurat | Veer Ras Hindi Kavita

 

चल उठ बालिका! माँ काली बनकर दरिंदों का संहार कर | वीर रस हिंदी कविता | कविता कुंजी 
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        यह कविता जून 2026 में राजस्थान के श्रीगंगानगर में 13 वर्षीय एक नाबालिग बालिका के साथ हुई अमानवीय और जघन्य घटना से व्यथित होकर लिखी गई है। 

        यह कविता उस साहसी बेटी तथा ऐसी हर बेटी को समर्पित है, जिसने अन्याय, हिंसा या दरिंदगी का सामना किया है।

      यह रचना समाज को जागरूक करने, बेटियों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाने और अन्याय के विरुद्ध साहस, एकजुटता तथा न्याय की आवाज़ बुलंद करने का एक विनम्र प्रयास है।

चल उठ हिम्मत जुटा बालिका, दुनियां को आज दिखा दे तू।

दानव के वंशजों के खातिर, मां काली  रूप बना ले तू।

त्रिशूल उठा खंजर को घोंप, दरिंदों की लाश बिछा दे तू।

बढ़ती पीढ़ी महिषासुर की, पूर्णविराम लगा दे तू।

त्राहिमाम जब देव पुकारें, करती रक्षा उनकी तू,

महादेव भी थर थर कांपे, जब बनती शेर वाहिनी तू।

कलियुग में नहीं सुरक्षित नारी, दरिंदों को सबक सिखा दे तू।

आज 'चंण्ड मुण्ड' फिर पनप रहे हैं, फिर त्रिशूल घुमा दे तू।


टिप्पणियाँ

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